पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल.) का क़रीबी रिश्तेदारों को इस्लाम की ओर बुलाना

पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल.) का क़रीबी रिश्तेदारों को इस्लाम की ओर बुलाना

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

(अल्लाह दयावान, कृपाशील के नाम से)

प्रिय दर्शको,

आप यह बात सुन चुके हैं कि नबी (सल्ल.) को पैग़म्बरी जैसी महान ज़िम्मेदारी सौंपी गई। आप (सल्ल.) के नबी बनाए जाने के बाद सबसे पहले आपकी पत्नी हज़रत ख़दीजा (रज़ि.) ईमान लाईं, फिर आपने अपने सच्चे दोस्त अबू-बक्र सिद्दीक़ (रज़ि.) को, जो आप (सल्ल.) से एक-दो साल ही छोटे थे, इस्लाम की शिक्षाओं से परिचित कराया। उन्होंने कहा, “मेरे माँ-बाप आपपर क़ुरबान, आपने सच फ़रमाया, और सच बोलना आपका काम है। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद (उपास्य) नहीं और आप अल्लाह के रसूल (सन्देष्टा) हैं।”

हज़रत अबू-बक्र (रज़ि.) के बाद हज़रत ज़ैद (रज़ि.), जो ग़ुलाम थे, और आप (सल्ल.) की छत्रछाया में रह रहे थे, उनके सामने बात पेश की। हज़रत अली (रज़ि.) जो आपके चचेरे भाई थे, और उस समय बहुत छोटे से थे, वह भी ईमान ले आए।

उसके बाद नबी करीम (सल्ल.) को अल्लाह की ओर से आदेश दिया गया कि “अपने निकटवर्ती संबंधियों को डराओ।” (क़ुरआन, 26/214) चुनाँचे आपने एक छोटी सी दावत का प्रबंध किया और अपने सारे क़रीबी लोगों को बुलाया। उस दावत में आप (सल्ल.) के कई चचा आए थे, आपकी फूफी सफ़िया आई थीं, और उन सबके सामने आपने इस्लाम के सन्देश को पेश किया और बुनियादी बातें कहने के बाद आप (सल्ल.) ने कहा कि “अल्लाह तआला ने मुझे समस्त मानवजाति के मार्गदर्शन के लिए भेजा है, अरबवालों के मार्गदर्शन के लिए भी भेजा है, क़ुरैश के मार्गदर्शन के लिए भी भेजा है। आप मेरे रिश्तेदार हैं और मैं आपके सामने इस सन्देश को पेश करता हूँ।”

परंपराएँ और कल्पनाएँ इंसानों का पीछा आसानी से नहीं छोड़तीं। चुनाँचे आप (सल्ल.) ने जब पूछा कि “आप बताइए, मैं इस्लाम के सन्देश को फैलाना चाहता हूँ, अल्लाह के बन्दों को अल्लाह तआला की ओर बुलाना चाहता हूँ, इस काम में आपमें से कौन मेरा साथ देगा?”

सब चुप थे, चचा चुप थे, फूफियाँ चुप थीं, सब सोच रहे थे कि यह सन्देश तो कुछ नई तरह का सन्देश है, और इस सन्देश को स्वीकार करके हम दुनिया भर का विरोध क्यों मोल लें? इससे तो हम समाज में तिरस्कृत हो जाएँगे। ऐसे में अल्लाह तआला ने हज़रत अली को यह साहस दिया, जो उस समय अभी कम उम्र ही थे, वे खड़े हुए और बोले, “मेरे चचेरे भाई, अगरचे मैं अभी बहुत छोटा हूँ, मेरी टाँगें पतली हैं, और इस समय तो मेरी आँखें भी दुख रही हैं। लेकिन इंशाअल्लाह, मैं आपका साथ दूँगा।”

हज़रत अली (रज़ि.) उस समय अगरचे बहुत छोटे थे, लेकिन चूँकि उनका मन-मस्तिष्क साफ़ था, उनकी अन्तरात्मा साफ़ थी, इसलिए वे तुरन्त उस सन्देश को समझ गए और उन्होंने उसी समय नबी (सल्ल.) का साथ देने की प्रतिज्ञा की और फिर जीवन भर उस प्रतिज्ञा का पालन किया, यहाँ तक कि वह रात जो बड़ी ग़ज़ब की रात थी, जब नबी करीम (सल्ल.) मक्का छोड़कर मदीना जानेवाले थे, और जब सारे इस्लाम-विरोधी सरदार, उनकी ओर से चुने हुए नौजवानों को तलवारों के साथ तैनात कर दिया गया था कि कल प्रातःकाल हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) को ज़िन्दा बाहर नहीं आने देना है।

उस समय आप (सल्ल.) ने कहा, “ऐ अली, जानते हो मेरा बिस्तर?”

हज़रत अली ने कहा, “जी अल्लाह के रसूल।”

आप (सल्ल.) ने कहा, “यह बिस्तर आज तलवारों के साए में है। देखो, कई लोगों की मेरे पास अमानतें हैं, किसी का रुपया है, किसी के ज़ेवरात हैं, इन सब चीज़ों को तुम कल सुबह जिन-जिनकी अमानतें हैं, उन तक पहुँचा देना। फिर उसके बाद तुम मदीना आना।”

हज़रत अली (रज़ि.) ने उस समय भी तलवारों के साए में उस रात को आराम के साथ बिताया और उन्हें इतनी अच्छी नींद आई कि शायद जीवन में पहले कभी न आई होगी। क्या सोच थी? मैं कट जाऊँ, लेकिन अल्लाह के रसूल (सल्ल.) बच जाएँ। सोच यह थी कि ‘मैं अपनी जान अल्लाह के सिपुर्द कर दूँगा, लेकिन इस्लाम का क़ाफ़िला आगे बढ़ना चाहिए।’

आज की तरह पहले भी मुश्किल हालात गुज़रे हैं, और आगे भी ऐसे हालात आ सकते हैं, लेकिन हमारी यही सोच होनी चाहिए। हम मानवता के हितैषी हैं, हम मानवता के सेवक हैं, अपना उद्देश्य इसके सिवा और कुछ नहीं है कि लोग अपने रब को, अपने मालिक को, अपने ईश्वर को पहचान लें, उसके बन्दे और दास बन जाएँ और इंसानों की दासता से मुक्त हो जाएँ।

हज़रत अली (रज़ि.) की बचपन में ही इस्लाम के प्रति जो भावना थी, इस्लाम का सन्देश दूसरों तक पहुँचाने के लिए वह भावना हमारे और आपके अन्दर होनी चाहिए। यह हम अपने स्वार्थ के लिए, सत्ता पाने के लिए या धनोपार्जन के लिए नहीं करें, बल्कि केवल इसलिए करें कि अल्लाह तआला के बन्दे (इंसान) अल्लाह तआला के सन्देश से अवगत हो जाएँ, उसके आज्ञाकारी बन जाएँ और उनकी आख़रित (परलोक) भी सुधर जाए और सांसारिक जीवन भी बेहतर हो जाए। हमको और आपको इस उद्देश्य के लिए समर्पित कर देना चाहिए। अल्लाह से दुआ है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी हमको इस सोच को अपनाने और इस दावत से जुड़े रहने का सौभाग्य प्रदान करे।

व आख़िरु दअवा-न अनिल्हम्दुलिल्लाहि रब्बिल-आलमीन।

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