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सिर्फ बंगाली भाषा बोलने पर विदेशी घोषित..? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा जवाब

सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर जोर देते हुए कोर्ट ने कहा कि बंगाली और पंजाबी बोलने वाले भारतीयों की वही सांस्कृतिक और भाषाई विरासत है, जो सीमा पार रहने वाले लोगों की भी है.

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने आज यानी कि शुक्रवार, 29 अगस्त को केंद्र सरकार से यह सफाई मांगी कि क्या सिर्फ बंगाली भाषा बोलने की वजह से मुस्लिम प्रवासी मजदूरों को विदेशी मानकर हिरासत में लिया गया है. कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ भाषा के आधार पर किसी की नागरिकता तय नहीं की जा सकती.

याचिका में क्या मांग की गई?

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत, जॉयमाल्य बागची और विपुल एम. पांचोली की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की और याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर अंतरिम अर्जी पर नोटिस जारी किया. इस याचिका में मांग की गई है कि किसी भी व्यक्ति को उसकी नागरिकता की सही जांच किए बिना देश से बाहर न निकाला जाए.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा से जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से एक हफ्ते के अंदर जवाब मांगा है. साथ ही, गुजरात राज्य को भी मामले में पक्षकार बनाया गया है, क्योंकि एक अर्जी में बताया गया था कि गुजरात में भी इसी तरह लोगों को उठाकर बाहर निकाला जा रहा है.

याचिकाकर्ताओं ने क्या कहा?

सुनवाई की शुरुआत में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए एडवोकेट प्रशांत भूषण ने बताया कि एक महिला सुनाली बीबी (जिसका जिक्र याचिका में है) को सिर्फ इस शक में कि वो बांग्लादेशी हैं, भारत से जबरन बाहर कर दिया गया, जबकि किसी भी अधिकारी ने यह तय नहीं किया था कि वो विदेशी हैं.

एडवोकेट प्रशांत भूषण ने आगे कहा कि महिला गर्भवती है, और उसे केवल इसलिए देश से बाहर कर दिया गया क्योंकि वो बंगाली बोलती है.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर जोर देते हुए कोर्ट ने कहा कि बंगाली और पंजाबी बोलने वाले भारतीयों की वही सांस्कृतिक और भाषाई विरासत है, जो सीमा पार रहने वाले लोगों की भी है. ये लोग एक ही भाषा बोलते हैं, लेकिन इतिहास में सीमाएं बन जाने के कारण अलग हो गए.

जस्टिस बागची ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि हम चाहते हैं कि आप यह स्पष्ट करें कि क्या किसी भाषा के उपयोग को विदेशी मान लेने का आधार बनाया गया है?

‘बिना प्रक्रिया के देश से बाहर भेजा रहा है’

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि सीमा पर तैनात अधिकारी बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के लोगों को देश से बाहर भेज रहे हैं. उन्होंने बताया कि सुनाली बीबी के मामले में, जबकि कलकत्ता हाई कोर्ट में उनकी ओर से हैबियस कॉर्पस याचिका लंबित थी, फिर भी उन्हें सिर्फ इस धारणा के आधार पर भारत से बाहर कर दिया गया कि बंगाली बोलने वाले लोग बांग्लादेशी होते हैं.

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