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Jamaat-e-Islami Hind ने केंद्रीय बजट 2026-27 के लिए वित्त मंत्रालय को व्यापक सुझाव सौंपे

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद का सुझाव मुख्य रूप से रोजगार बढ़ाने, धन के वितरण को बेहतर बनाने और मांग-आधारित विकास को मजबूत करने पर केंद्रित हैं.

नई दिल्ली, 20 जनवरी 2026: जमाअत-ए-इस्लामी हिंद (Jamaat-e-Islami Hind) ने भारत सरकार के वित्त मंत्रालय को एक विस्तृत सुझाव सौंपी है, जिसमें यूनियन बजट 2026-27 के लिए निति-निर्धारित सुझाव दिए गए हैं. ये सुझाव रोजगार बढ़ाने, धन के वितरण को बेहतर बनाने और मांग-आधारित विकास को मजबूत करने पर केंद्रित हैं. जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने एक बार फिर सरकार के सामने सबूतों पर आधारित और नतीजों पर केंद्रित सिफारिशें पेश की हैं जिसका मकसद भारतीय अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक असंतुलन को दूर किया जा सके.

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने क्या कहा?

ये सुझाव भारत के हालिया आर्थिक प्रदर्शन के एक बड़े नीतिगत संदर्भ में है. हालांकि देश ने लगातार सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के विकास, बढ़ते वित्तीय बाजार और बढ़ती कॉर्पोरेट लाभप्रदता के रूप में धन सृजन करने की मजबूत क्षमता दिखाई है, लेकिन ये फायदे समान रूप से दौलत के बंटवारे या पर्याप्त रोजगार पैदा करने में प्रवर्तित नहीं हुए हैं. आय और धन-संग्रह के संकेतक, साथ ही विकास की कमजोर रोजगार लचीलापन और ज्यादा युवा बेरोजगारी राजस्व सुधार की जरूरत को रेखांकित करते हैं. भोजन, स्वास्थ्य सेवा, आवास और शिक्षा जैसी जरूरी चीजों पर बढ़ते घरेलू खर्च ने खपत और घरेलू मांग को और सीमित कर दिया है.

जमाअत ने दिए ये सुझाव

इस पृष्ठभूमि से सुझावों में राजकोषीय नीति बनाने में रोजगार के नतीजों को साफ तौर पर शामिल करने की जरूरत पर जोर दिया गया है. इसमें बड़े सार्वजनिक खर्चों और इंसेंटिव के श्रम-प्रभाव का आकलन करने के लिए संस्थागत तंत्र का प्रस्ताव है, साथ ही क्लाइमेट-रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर, शहरी सेवाओं और संरक्षण कार्य पर केंद्रित लक्षित शहरी रोजगार पहल भी शामिल हैं. ग्रामीण इलाकों के लिए सुझावों में गैर-कृषि रोजगार के लिए जिला-स्तरीय, जगह-आधारित दृष्टिकोण की वकालत की गयी है जो स्थानीय आर्थिक ताकतों पर आधारित हो और आधारभूत संरचना, खरीद और स्थानीय भर्तियोंसे जुड़े रियायती वित्त के जरिए समर्थित हो.

इन सिफारिशों में रोजगार के नतीजों को बेहतर बनाने के लिए लघु, कुटीर और मध्यम उद्दयमों से संबंधित सार्वजनिक ऋण सहायता के लिए नयी रूपरेखा तैयार करने की भी बात कही गई है. खासकर महिलाओं और पहली बार काम करने वालों के लिए क्रेडिट इंसेंटिव को सत्यापित रोजगार सृजन से जोड़कर. इन सुझावों का मकसद सार्वजनिक वित्त पर सामाजिक लाभ को बढ़ाना है. इसी तरह, सुझावों में औद्योगिक प्रोत्साहन योजना को श्रम प्रोत्साहन क्षेत्र की ओर दुबारा उन्मुखी बनाने पर जोर दिया गया है जिसमें रोजगार-आधारित इंसेंटिव दिए जाएं जो पूंजी की तीव्रता के बजाय रोजगार सघनता को प्रतिफल दें.

यह मानते हुए कि आय में उतार- चढ़ाव ग्रामीण संकट का एक मुख्य कारण बन गया है, इन सुझावों में कृषि क्षेत्र में निति का निर्धारण निवेश समर्थन से हटाकर आय को स्थिर करने पर किया गया है. सुझावों में मूल्य- कमी भुगतान, फसल विविधीकरण के लिए प्रोत्साहन, गैर-मौसमी ग्रामीण कामों का विस्तार, और संस्थागत क्रेडिट में धीरे-धीरे आय को स्थिर करने वाले तरीकों की ओर बदलाव शामिल हैं. स्वास्थ्य सम्बन्धी खर्चों से होने वाली परिवारों की वित्तीय कमजोरी को कम करने पर भी ध्यान दिया गया है, जिसके लिए ऐसे उपाय किए जाएं जो सीधे जेब से होने वाले खर्च को कम किया जा सके.
इस सिफारिश में शिक्षित बेरोजगारी की समस्या का समाधान करने के लिए संरचित शिक्षा-से-रोजगार परिवर्तन तंत्र का प्रस्ताव भी दिया गया है, जिसमें सशुल्क शिक्षुता और कौशल-आधारित छात्रवृत्ति शामिल हैं, और उन जिलों को प्राथमिकता देने की बात कही गयी है जहां स्नातक बेरोजगारी की दर अधिक है. इसके अलावा, इसमें मुसलमानों के लिए लक्षित सामाजिक-आर्थिक दखल की ज़रूरत पर जोर दिया गया है, जो लगातार शैक्षिक, रोजगार और क्रेडिट एक्सेस में होने वाली कमियों के स्थापित आनुभविक सबूतों पर आधारित है. इन उपायों में शिक्षा सहायता, उद्यम- अर्थव्यवस्था, कौशल और रोजगार समूहों और पब्लिक प्रोक्योरमेंट में मुस्लिम स्वामित्व वाले MSMEs की बेहतर भागीदारी पर ध्यान दिलाया गया है.

रेवेन्यू के मामले में भारत के कर-संरचना को मध्यम अवधि में पुनः संतुलित करने की सलाह दी गई है, ताकि परोक्ष कर पर बहुत ज़्यादा निर्भरता कम हो और प्रगतिशील प्रत्यक्ष कराधान को मजबूत किया जा सके. इसमें विलासिता से जुड़े खपत, सट्टेबाजी से होने वाले मुनाफे और डिजिटल मूल्य निर्माण पर चुनिंदा टैक्स लगाने के साथ-साथ, अनुमानित और नतीजों से जुड़े हस्तांतरण के जरिए राज्य की वित्तीय क्षमता बढ़ाने के उपायों पर भी बात की गई है.

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद दोहराती है कि केंद्रीय बजट के लिए रचनात्मक सुझाव देना वार्षिक प्रक्रिया का हिस्सा रहा है, जो समावेशी और सामाजिक रूप से जिम्मेदार आर्थिक नीति बनाने के प्रति इसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है. इस संदर्भ में जमाअत दूसरे मुस्लिम संगठनों और सिविल सोसायटी संस्थानों से भी अपील करती है कि वे भी अपने रचनात्मक सुझाव वित्त मंत्रालय को भेजें, ताकि अलग-अलग सामाजिक-आर्थिक चिंताओं को राष्ट्रीय बजट प्रक्रिया में जगह मिल सके.

सुझावों के अंत में इस बात पर जोर दिया गया है कि भारत की मुख्य आर्थिक चुनौती केवल धन सृजन में नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने में है कि विकास से रोजगार, आय सुरक्षा और सभी के लिए समान सामाजिक नतीजे बरामद हों. इन सुझावों को 2026-27 के यूनियन बजट को अंतिम रूप देने में विचार के लिए सम्मानपूर्वक वित्त मंत्रालय के सामने रखा गया है.

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