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Bihar SIR: चुनाव आयोग ने मुस्लिम बहुल जिलों को जारी किया नोटिस.. वोटर लिस्ट की होगी गहन जांच

चुनाव आयोग द्वारा पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, मधुबनी, किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार, अररिया और सुपौल जिलों को नोटिस जारी किया गया है.

Bihar SIR Controversy: बिहार में चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया जारी है. इसी बीच चुनाव आयोग ने बिहार के सीमावर्ती और मुस्लिम बहुल आठ जिलों को नोटिस जारी किया है. चुनाव आयोग (ECI) के सूत्रों के अनुसार, कई लोगों के दस्तावेज अधूरे, गलत डॉक्यूमेंट्स और नागरिकता के शक के आधार पर नोटिस जारी किया गया है.

चुनाव आयोग द्वारा पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, मधुबनी, किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार, अररिया और सुपौल जिलों को नोटिस जारी किया गया है.

मुस्लिम आबादी वाले जिलों को मिला नोटिस

बता दें कि किशनगंज में मुस्लिमों की आबादी बहुसंख्यक है. वहीं इसके अलावा बाकी के इन जिलों में मुख्य रूप से मुसलमानों और दलितों की आबादी है. चुनाव आयोग इन जिलों में मतदाता सूची में नाम जोड़ने को लेकर गंभीरता से जांच कर रहा है.

अधिकारियों के अनुसार, इन जिलों में मतदाता पंजीकरण अधिकारियों (EROs) ने इस सप्ताह की शुरुआत से ही आवेदन पत्रों की जांच शुरू कर दी है और नोटिस जारी कर दिए गए हैं. सुनवाई अगले सप्ताह से शुरू होगी. पहली सुनवाई 3 सितंबर को रक्सौल में होगी, इसके बाद 7 सितंबर को मधुबनी में सुनवाई होगी.

नोटिस में क्या कहा गया ?

चुनाव आयोग द्वारा जारी प्रत्येक नोटिस में यह लिखा गया है कि आवेदकों द्वारा मतदाता सूची में जमा किए गए दस्तावेज असंतोषजनक हैं. नोटिस प्राप्त करने वाले व्यक्ति को निर्धारित तारीख, समय और स्थान पर मूल दस्तावेजों के साथ ERO (मतदाता पंजीकरण अधिकारी) के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है.

निर्वाचन आयोग (ECI) के 24 जून के आदेश के तहत, ERO को यह अधिकार दिया गया है कि वे सभी दावों की जांच कर सकते हैं, स्वयं से (suo motu) कार्रवाई शुरू कर सकते हैं और किसी भी मतदाता को नोटिस जारी कर सकते हैं.

अगर किसी मतदाता का नाम अंतिम मतदाता सूची से हटाया जाता है, तो ERO को एक स्पष्ट आदेश (speaking order) जारी करना होगा, जिसमें नाम हटाने के कारणों का विवरण देना अनिवार्य होगा.

विपक्षी पार्टियों का गंभीर आरोप

बिहार में चल रही SIR प्रक्रिया को लेकर सियासी घमासान मचा हुआ है. विपक्षी पार्टियों ने आरोप लगाया है कि इस प्रक्रिया के जरिए सरकार एनआरसी को गुपचुप तरीके से लागू करना चाहती है. उनका कहना है कि यह प्रक्रिया गरीब और प्रवासी मतदाताओं के खिलाफ है, और इसका सबसे ज्यादा असर मुस्लिम बहुल इलाकों में देखने को मिल रहा है, जहां लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने की आशंका है.

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