इस्लाम के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) का बचपन

इस्लाम के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) का बचपन

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
(अल्लाह दयावान, कृपाशील के नाम से)

प्रिय दर्शको, आप सबको मेरा प्यार भरा सलाम।

माँ और दादा के मरने के बाद आप (सल्ल.) के चचा अबू तालिब ने आपको लगभग आठ वर्ष की आयु से अपने संरक्षण में ले लिया था। दिन बीतते जा रहे थे। मक्का के लोग जो बड़े व्यापारी थे, सर्दी के दिनों में यमन की ओर जाते थे, गर्मी के मौसम में रोम की ओर जाते थे। व्यापार ही उनका पेशा और रोज़गार था। अतः आप (सल्ल.) के चचा अबू तालिब ने व्यापारिक क़ाफ़िले के साथ जाने की योजना बनाई तो प्यारे मुहम्मद (सल्ल.) जो उस समय आठ वर्ष के थे, चचा की जुदाई बर्दाश्त न कर सके और उनसे लिपट गए, “नहीं चचा जान, मैं भी आपके साथ चलूँगा।” बच्चे के इस निवेदन को स्वीकार कर लिया गया और चचा ने आप (सल्ल.) को भी साथ ले लिया, यह सोचकर कि इस प्रकार बच्चा कुछ सीखेगा, कुछ उसे भी अनुभव होगा। सीरिया के सफ़र पर जब ये सब लोग जा रहे थे तो एक जगह वृक्षों की छाँव में पड़ाव डाला गया। वहाँ पर ‘बुसरा’ नामक एक जगह थी, जहाँ एक ईसाई राहिब (संन्यासी) रहा करता था, उसका नाम ‘बहीरा’ था। क़ाफ़िले के पड़ाव डालने के बाद लोग अपने-अपने कामों में व्यस्त थे, थकन दूर कर रहे थे, कोई दस्तरख़ान बिछा रहा था। तभी बहीरा की ओर से सन्देश आया कि आप सब लोग बहीरा के मेहमान हैं। सबको बहुत आश्चर्य हुआ कि यह कैसी कृपा हो रही है, अभी तक तो ऐसा नहीं हुआ था।

वे सब लोग बहीरा के यहाँ गए। उसने बहुत अच्छी तरह दावत का प्रबंध कर रखा था। उसने पूछा कि क्या सब लोग आ गए हैं या कोई बाक़ी रह गया है। बताया गया कि सब लोग आ गए हैं, हाँ एक बच्चा है वह नहीं आया है। उसने कहा, “उस बच्चे को भी लेकर आओ।” तो हज़रत अबू तालिब आप (सल्ल.) को लेने के लिए आए। उस वक़्त तक बहीरा बहुत सी बातें पूछ चुका था। आप लोग कौन हैं? किस ख़ानदान से हैं? किधर जा रहे हैं? कई बातें पूछीं। अल्लाह के रसूल (सल्ल.) के बारे में भी बहुत सी बातें पूछीं। इसका स्वभाव कैसा है, कितनी विनम्रता है अभी से इसमें, शिष्टाचार का आदर्श मालूम होता है। बहीरा ने यह भी पूछा कि इस बच्चे का बाप कौन है? अबू तालिब ने कहा, “मैं ही इसका बाप हूँ।” बहीरा बोला, “नहीं, आप इसके बाप नहीं हो सकते।” अबू तालिब यह बात सुनकर चौंक गए। बहीरा बोला, “यह यतीम होगा।” अबू तालिब ने कहा, “तुम ठीक कहते हो। यह मेरे भाई अब्दुल्लाह का बेटा है। उसका इंतिक़ाल हो चुका है। मैं ही इसका संरक्षण करता हूँ। यह मेरे बच्चे की तरह है, मैं इसको पाल रहा हूँ।”

बहीरा बोला, “मैं तुम्हारे इस बच्चे की आँखों में शराफ़त की रौशनी देखता हूँ। इसके माथे पर सौभाग्य के सितारे को चमकता हुआ महसूस करता हूँ। यह बहुत बड़ा आदमी, बहुत महान व्यक्ति बनेगा। हाँ देखो, इसको ज़रा यहूदियों से बचाकर रखना। अगर उन्हें यह मालूम हो जाए कि बच्चा आगे चलकर क्या कुछ बन सकता है तो इसके पीछे पड़ जाएँगे।”

बहीरा के मुँह से ये सब बातें सुनकर अबू तालिब को बहुत आश्चर्य हुआ। फिर बात आई-गई हो गई। उन्होंने क़ाफ़िले के साथ व्यापार किया और फिर सीरिया से वापस आ गए। इस घटना को उद्धृत करते हुए इस्लाम से दुश्मनी रखने वाले ईसाई, विशेषकर पादरी आदि कहते हैं कि मुहम्मद (सल्ल.) ने तो आठ वर्ष की आयु में सारी बातें बहीरा नामक राहिब से सीख ली थीं। जबकि नबी (सल्ल.) पढ़े-लिखे नहीं थे, उम्मी थे। इस बात को अल्लाह ने क़ुरआन में फ़रमाया—
اَلَمْ يَجِدْكَ يَتِيْمًـا فَاٰوٰى۝۶۠ وَوَجَدَكَ ضَاۗلًّا فَہَدٰى۝۷۠ وَوَجَدَكَ عَاۗىِٕلًا فَاَغْنٰى۝۸ۭ
“क्या ऐसा नहीं कि उसने तुम्हें अनाथ पाया तो ठिकाना दिया? और तुम्हें मार्ग से अपरिचित पाया तो मार्ग दिखाया? और तुम्हें निर्धन पाया तो समृद्ध कर दिया?” (क़ुरआन, 93/6-8) और इसलिए अल्लाह तआला ने आप (सल्ल.) को नसीहत की—
فَاَمَّا الْيَتِيْمَ فَلَا تَقْہَرْ وَاَمَّا السَّاۗىِٕلَ فَلَا تَنْہَرْ وَاَمَّا بِنِعْمَۃِ رَبِّكَ فَحَدِّثْ
“अतः जो अनाथ हो उसे मत दबाना, और जो माँगता हो उसे न झिड़कना, और जो तुम्हारे रब की अनुकम्पा है, उसे बयान करते रहो।” (क़ुरआन, 93/9-11)

हमें भी इस नसीहत पर हमेशा अमल करना चाहिए।

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