Homeदेशनेपाल की विनाशकारी बाढ़ पर जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने जताया दुख

नेपाल की विनाशकारी बाढ़ पर जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने जताया दुख

नेपाल के करीबी पड़ोसी होने के नाते भारत को नेपाली अधिकारियों के साथ मिलकर मदद देनी चाहिए। इसमें खास तौर पर सर्च-एंड-रेस्क्यू टीमें, चिकित्सा सहायता, आपातकालीन आपूर्ति, लॉजिस्टिकल सपोर्ट और ज़रूरत पड़ने पर आपदा प्रबंधन में तकनीकी विशेषज्ञता शामिल होनी चाहिए।

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष एस. अमीनुल हसन ने नेपाल में विनाशकारी बाढ़ पर गहरा दुख और चिंता व्यक्त की है। अचानक आई बाढ़ से जान-माल को भारी क्षति पहुंची है।

मीडिया को जारी एक बयान में के जमाअत के उपाध्यक्ष ने कहा, “इस भारी त्रासदी के समय हमारी संवेदनाएं नेपाल के लोगों के साथ हैं। हम मृतकों के परिजनों के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करते हैं और प्रभावित लोगों की सुरक्षा और जल्द ठीक होने की ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। तत्काल प्राथमिकता जीवन बचाना, लापता लोगों का पता लगाना और प्रभावित परिवारों को भोजन, पानी, आश्रय, चिकित्सा देखभाल और हर प्रकार की मानवीय सहायता सुनिश्चित करना है। नेपाल के करीबी पड़ोसी होने के नाते भारत को नेपाली अधिकारियों के साथ मिलकर मदद देनी चाहिए। इसमें खास तौर पर सर्च-एंड-रेस्क्यू टीमें, चिकित्सा सहायता, आपातकालीन आपूर्ति, लॉजिस्टिकल सपोर्ट और ज़रूरत पड़ने पर आपदा प्रबंधन में तकनीकी विशेषज्ञता शामिल होनी चाहिए। सैटेलाइट से निगरानी, मौसम और उसके प्रभाव का पूर्वानुमान और आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में भारत की क्षमताएं नेपाल को और अधिक बाढ़ और भूस्खलन के जोखिम का आकलन करने और तत्काल प्रतिक्रिया को मजबूत करने में भी मदद कर सकती हैं।”

एस. अमीनुल हसन ने आगे कहा, “इस त्रासदी ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्र (जिसमें भारत के कई इलाके भी शामिल हैं) के अत्यधिक मौसम की घटनाओं, ग्लेशियरों के अस्थिर होने, बाढ़ और अन्य सिलसिलेवार आपदाओं के प्रति बढ़ते जोखिम को उजागर किया है। बढ़ता तापमान, ग्लेशियर का खिसकना और मौसम के बदलते और अनिश्चित पैटर्न नए और अप्रत्याशित जोखिम पैदा कर रहे हैं। हमें आपदा के बाद प्रतिक्रिया करने की संस्कृति से हटकर रोकथाम और दीर्घकालिक तैयारी की संस्कृति की ओर बढ़ना चाहिए। ग्लेशियर, ग्लेशियल झीलों, अस्थिर ढलानों और ज़्यादा ऊंचाई वाले जल-स्रोतों की व्यापक और वैज्ञानिक निगरानी की तत्काल आवश्यकता है। सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों, रिमोट सेंसिंग, ज़मीन पर आधारित निगरानी और भरोसेमंद अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम को मज़बूत किया जाना चाहिए ताकि नदी के निचले इलाकों में रहने वाले और जोखिम का सामना कर रहे समुदायों को समय पर चेतावनी मिल सके। सरकारों को हिमालय के पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील इलाकों में सड़कों, पनबिजली परियोजनाओं, पर्यटन से जुड़े बुनियादी ढांचे और विकास से जुड़ी दूसरी गतिविधियों के लिए पर्यावरण और आपदा-जोखिम का कड़ाई से आकलन करना चाहिए।”

जमाअत के उपाध्यक्ष ने कहा, “हम सरकारों, मानवीय संगठनों और क्षेत्रीय लोगों से अपील करते हैं कि वे नेपाल के प्रभावित लोगों की मदद के लिए आगे आएं। हमें उम्मीद है कि इस त्रासदी में गई जानें सरकारों और नीति-निर्माताओं को आपदा के जोखिम को कम करने और हिमालयी इलाकों में रहने वाले कमज़ोर समुदायों की सुरक्षा के लिए तुरंत और लगातार कदम उठाने के लिए प्रेरित करेंगी।”

spot_img
1,716FansLike
6,134FollowersFollow
118FollowersFollow
20,800SubscribersSubscribe