Maulana Arsahd Madni On UCC: पिछले दिनों केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मुंबई में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर बड़ा बयान दिया. उन्होंने भाजपा और उसकी अगुवाई वाली सरकारें साल 2029 के भीतर 21 राज्यों में UCC लागू करेंगी. इस बयान के बाद देश भर में बवाल खड़ा हो गया है. विपक्षी दलों ने इस बयान का विरोध किया है. वहीं, बिहार में भाजपा के साथ गठबंधन में सरकार चलाने वाली JDU के नेता भी बिरा में UCC लागू नहीं होने देने की बातो को दोहराया है. इस बीच जमीयत-उलमेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने इस मुद्दे को लेकर सोशल मीडिया पर बयान जारी किया है.
मौलाना अरशद मदनी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पहले ट्वीटर) पर लिखा, “गृह मंत्री का यह ऐलान कि 2029 से पहले एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू कर दी जाएगी, एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है कि देश संविधान से चलेगा या किसी राजनीतिक दल के वैचारिक एजेंडे से?”
उन्होंने आगे लिखा, “समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करना संविधान की सर्वोच्चता और नागरिकों को प्राप्त धार्मिक स्वतंत्रता को समाप्त करने की एक सुनियोजित कोशिश है. जमीयत उलमा-ए-हिंद देश के धर्मनिरपेक्ष संविधान, लोकतंत्र और कानून के शासन को कायम रखना चाहती है. इसलिए उन्होंने समान नागरिक संहिता (UCC) के खिलाफ उत्तराखंड हाईकोर्ट का रुख किया है और उम्मीद है कि हमें न्याय मिलेगा. उत्तराखंड हाईकोर्ट में अब तक छह सुनवाई हो चुकी हैं और जमीयत उलमा-ए-हिंद की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल सहित अन्य वकील अदालत में पेश हो चुके हैं.”
बयान में आगे लिखा गया, “हम ऐसा कोई कानून स्वीकार नहीं कर सकते जो शरीयत के खिलाफ हो. मुसलमान हर चीज से समझौता कर सकता है, लेकिन अपने धर्म और दीन से हरगिज़ कोई समझौता नहीं कर सकता. यह सवाल मुसलमानों के वजूद का नहीं, बल्कि उनके संवैधानिक और धार्मिक अधिकारों का है. सरकार समान नागरिक संहिता के माध्यम से मुसलमानों से वे अधिकार छीनना चाहती है, जो देश के संविधान ने उन्हें दिये हैं.
बयान में आगे लिखा गया, “मुस्लिम पारिवारिक कानून मनुष्यों द्वारा बनाए गए कानून नहीं हैं, बल्कि कुरआन मजीद और हदीस से लिए गए हैं, जो लोग किसी धार्मिक पर्सनल लॉ के तहत अपने मामलों का संचालन नहीं करना चाहते, उनके लिए देश में पहले से ही वैकल्पिक नागरिक कानून मौजूद हैं. ऐसे में अनिवार्य समान नागरिक संहिता की आवश्यकता क्यों है?”
बयान में आगे लिखा गया, “एक और बुनियादी सवाल यह है कि यदि संविधान के प्रावधानों के तहत अनुसूचित जनजातियों को इस कानून से छूट दी जा सकती है, तो संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मुसलमानों को प्राप्त धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान क्यों नहीं किया जा सकता? समान नागरिक संहिता के नाम पर यह भेदभाव क्यों?”
बयान में आगे लिखा गया, “यह मुद्दा केवल मुस्लिम पर्सनल लॉ का नहीं, बल्कि देश के धर्मनिरपेक्ष संविधान को उसकी मूल भावना के साथ बनाए रखने का है. भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यही है कि सरकार का अपना कोई धर्म नहीं होता तथा देश के नागरिक अपने धार्मिक मामलों में स्वतंत्र होते हैं. इसलिए ऐसा समान नागरिक संहिता, जो धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करे, मुसलमानों के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकती.”
सरकार ‘‘एक देश, एक कानून’’ और ‘‘एक घर में दो कानून नहीं हो सकते’’ जैसे नारे देती है, लेकिन भारत का कानूनी ढांचा स्वयं विभिन्न राज्यों में अनेक मामलों में अलग-अलग कानूनों की अनुमति देता है. आपराधिक कानूनों और उनके लागू करने में भी राज्य स्तर पर अंतर तथा विशेष प्रावधान मौजूद रहे हैं, जबकि गौहत्या से संबंधित कानून भी पूरे देश में एक समान नहीं हैं. जमीयत उलमा-ए-हिंद की तो पुरानी मांग रही है गांय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देकर पूरे देश में उसकी सुरक्षा को यकीनी बनाया जाए. ऐसे में यह कहना उचित होगा कि समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने का उद्देश्य नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता पर अंकुश लगाना और उनके संवैधानिक अधिकारों को सीमित करना है.

