Homeदेशट्रंप के टैरिफ कानून पर जमाअत की चिंता, भारत के हितों की...

ट्रंप के टैरिफ कानून पर जमाअत की चिंता, भारत के हितों की रक्षा की मांग

JIH Concern Over US Tariff Law: अमेरिकी कानून से रूस से तेल-गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ का खतरा है. जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने चिंता जताते हुए कहा कि इसका असर भारतीय निर्यातकों और आम लोगों पर पड़ सकता है. एस. अमीनुल हसन ने ऊर्जा स्रोतों में विविधता, नवीकरणीय ऊर्जा और रणनीतिक स्वायत्तता बढ़ाने की मांग की. पूरी खबर जानने के लिए नीचे स्क्रॉल करें.

JIH Concern Over US Tariff Law: अमेरिकी कांग्रेस द्वारा पारित कानून राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है. इन देशों में भारत भी शामिल है. जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष एस. अमीनुल हसन ने इस कानून पर गंभीर चिंता व्यक्त की है.

मीडिया को जारी एक बयान में जमाअत के उपाध्यक्ष ने कहा, ” जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ‘लिंडसे ओ. ग्राहम रूस और ईरान प्रतिबंध अधिनियम, 2026’ को लेकर गंभीर चिंता ज़ाहिर करती है. यह कानून रूस-यूक्रेन युद्ध पर अमेरिका की प्रतिक्रिया का दायरा बढ़ाता है जिसमें कूटनीतिक उपायों के अलावा कठोर और दंडात्मक आर्थिक उपाय भी शामिल हैं. यह रणनीति नैतिक और आर्थिक, दोनों रूप से गलत है. प्रथमतः, टैरिफ़ आयातकों पर लगाए गए हैं, लेकिन इसका बोझ अमेरिकी ग्राहकों, भारतीय निर्यातकों, कर्मचारियों और छोटे व्यवसायों पर पड़ता है.

साल 2025 में अमेरिका को भारत का एक्सपोर्ट लगभग 104 अरब डॉलर का था. आम भारतीय मज़दूरों और उनके परिवारों पर ऐसे जियोपॉलिटिकल विवाद का बोझ क्यों डाला जाए, जिसमें उनकी कोई भूमिका ही नहीं थी? ऊर्जा की स्थापित आपूर्ति में अचानक किसी भी तरह की रुकावट का असर परिवहन, उद्योग, खाने-पीने की चीज़ों की कीमतों और घरों के बजट पर पड़ेगा. द्वितीय, अगर अमेरिका के दबाव में भारत रूस से खरीदारी काफी कम भी कर देता है, तो भी उसे दूसरों से ज़्यादा कच्चा तेल हासिल करना होगा. इससे मध्य-पूर्वी, अफ़्रीकी या अन्य उत्पादकों से सप्लाई के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है.”

एस. अमीनुल हसन ने आगे कहा, “भारत की अपने 1.4 अरब लोगों के लिए सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा सुनिश्चित करने की दिलचस्पी जायज़ है. ऊर्जा सुरक्षा का सिद्धांत केवल सप्लाई सुरक्षित करने और आम आदमी तक सस्ती ऊर्जा पहुंचाने से कहीं आगे का होना चाहिए. आयातित तेल पर भारत की भारी निर्भरता एक संरचनात्मक कमज़ोरी है, न कि कोई अस्थायी समस्या. इसका अर्थ है कि दीर्घकालिक समाधान सिर्फ़ कोई ऐसा देश ढूंढना नहीं हो सकता जो सस्ता कच्चा तेल बेचने को तैयार हो, क्योंकि इससे केवल एक निर्भरता की जगह दूसरी निर्भरता आ जाएगी.

इसका असली समाधान यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की आयातित जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम किया जाए. इसके लिए सार्वजनिक परिवहन और रेलवे, नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, विकेंद्रीकृत बिजली उत्पादन और घरेलू विनिर्माण में बड़े पैमाने पर निवेश करने की ज़रूरत है. ऊर्जा के क्षेत्र में यह बड़ा बदलाव न सिर्फ़ पर्यावरण के लिए फ़ायदेमंद होगा, बल्कि इससे हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक आज़ादी को भी बढ़ावा मिलेगा.

जमाअत के उपाध्यक्ष ने भारत सरकार से आग्रह किया कि वह किसी एक भू-राजनैतिक ब्लॉक या ऊर्जा के स्रोत पर बहुत ज़्यादा निर्भर रहने के बजाय वास्तविक रणनीतिक स्वायत्तता अपनाए। उन्होंने कहा, “भारत को अपनी ऊर्जा और व्यापारिक साझेदारियों में विविधता लानी चाहिए और साथ ही रिन्यूएबल एनर्जी, पब्लिक ट्रांसपोर्ट, ऊर्जा दक्षता और ऐसे अन्य उपायों में निवेश बढ़ाना चाहिए जिनसे आयातित जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम हो सके. भारत को किसी खास भू-राजनैतिक खेमे में बंधने और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को कम करने से बचना चाहिए. हमारी विदेश और आर्थिक नीतियां शांति बनाए रखने, आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने और आम नागरिकों के कल्याण के लिए काम करने पर आधारित होनी चाहिए. हम भारत और अमेरिका के बीच लगातार कूटनीतिक बातचीत का आह्वान करते हैं ताकि इस विवाद को बड़े आर्थिक टकराव में बदलने से रोका जा सके। भारत सरकार को अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा करनी चाहिए, साथ ही यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उसके फैसले लोगों के कल्याण और देश के दीर्घकालिक हितों पर आधारित हों.”

spot_img
1,716FansLike
6,134FollowersFollow
118FollowersFollow
21,000SubscribersSubscribe