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‘मुसलमान सिर्फ अल्लाह की इबादत करता है..’ Vande Mataram को अनिवार्य किए जाने पर अरशद मदनी का कड़ा एतराज

मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि आज इस गीत को अनिवार्य कर देना और नागरिकों पर थोपने का प्रयास वास्तव में देशप्रेम नहीं, बल्कि चुनावी राजनीति, सांप्रदायिक एजेंडे और जनता का ध्यान मूल समस्याओं से हटाने की सोची-समझी चाल है.

Arshad Madani On Vande Mataram: केंद्र सरकार ने राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों या अन्य औपचारिक आयोजनों में गाना अनिवार्य कर दिया है. साथ ही ‘वंदे मातरम’ गाने और बजाने के दौरान हर व्यक्ति का खड़ा होना अनिवार्य होगा. ‘वंदे मातरम’ को अनिवार्य किए जाने पर मुस्लिम संगठनों और मुस्लिम समुदाय के लोगों ने कड़ी आपत्ति जताआ है. जमीयत उलेमा ए हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने ‘वंदे मातरम’ को अनिवार्य करने को पक्षपाती और ज़बरदस्ती थोपा गया फैसला बताया है.

‘धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला’

जमीयत उलेमा ए हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में सभी सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों, कॉलेजों और आयोजनों में इसकी समस्त पंक्तियों को अनिवार्य करना केंद्र सरकार का न केवल एक पक्षपाती और जबरदस्ती थोपा गया फैसला है, बल्कि यह संविधान में दी गई धार्मिक स्वतंत्रता पर खुला हमला और अल्पसंख्यकों के अधिकार छीनने का निंदनीय प्रयास है.

उन्होंने आगे कहा कि मुसलमान किसी को वंदे मातरम पढ़ने या उसकी धुन बजाने से नहीं रोकते, मगर क्योंकि उसकी कुछ पंक्तियां बहुदेववादी आस्था पर आधारित हैं और मातृभूमि को ईश्वर के रूप में प्रस्तुत करती हैं, जो एकेश्वरवादी धर्म की आस्था से टकराती हैं, इसलिए मुसलमान, जो केवल एक अल्लाह को मानता है, उसको इसे पढ़ने पर मजबूर करना संविधान की धारा 25 और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का खुला उल्लंघन है.

‘ये देशप्रेम नहीं, बल्कि चुनावी राजनीति’

मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि आज इस गीत को अनिवार्य कर देना और नागरिकों पर थोपने का प्रयास वास्तव में देशप्रेम नहीं, बल्कि चुनावी राजनीति, सांप्रदायिक एजेंडे और जनता का ध्यान मूल समस्याओं से हटाने की सोची-समझी चाल है. मातृभूमि से प्रेम का आधार नारे नहीं, बल्कि चरित्र और बलिदान हैं, जिनका उज्ज्वल उदाहरण मुसलमानों और जमीयत उलमा-ए-हिंद का अभूतपूर्व संघर्ष है. इस प्रकार के फैसले देश की शांति, एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करने के साथ- साथ संविधान का भी उल्लंघन हैं.

‘मुसलमान केवल एक अल्लाह की इबादत करता है’

जमीयत उलेमा ए हिंद के अध्यक्ष ने कहा कि याद रखिए.. मुसलमान केवल एक अल्लाह की इबादत करता है. हम सब कुछ बर्दाश्त कर सकते हैं, मगर अल्लाह के साथ किसी को शरीक करना कभी स्वीकार नहीं कर सकते. इसलिए वंदे मातरम को अनिवार्य कर देना संविधान की आत्मा, धार्मिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर खुला हमला है.

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