नई दिल्ली। Students Islamic Organisation of India (SIO) ने शुक्रवार को अपने दिल्ली स्थित मुख्यालय में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर यूजीसी के “उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने” से जुड़े नियम (UGC Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026) पर लगी रोक को लेकर गहरी चिंता जताई। संगठन ने कहा कि यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब देश के कई विश्वविद्यालयों में हाशिये के समुदायों से आने वाले छात्रों को आज भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है। ऐसे में इन नियमों को रोकना एक गंभीर और पीछे ले जाने वाला कदम है।
SIO मुख्यालय में आयोजित इस प्रेस वार्ता में बोलते हुए प्रो. Ajay Gudavarthy ने कहा कि केवल “जातिविहीन समाज” की बात करने से वास्तविक समस्याएँ खत्म नहीं हो जातीं। उन्होंने कहा कि आज भी कई उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों को उनकी जाति, नस्ल या धर्म के आधार पर अपमान, पूर्वाग्रह और संदेह की नजर से देखा जाता है। यह समस्याएँ रोजमर्रा की हकीकत हैं और इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उन्होंने Rohith Vemula और Dr. Payal Tadvi की संस्थागत मौत, Angel Chakma की नस्लवादी हत्या और Najeeb Ahmed के लापता होने के मामलों का जिक्र करते हुए कहा कि जब तक ऐसे अन्याय होते रहेंगे, तब तक विश्वविद्यालय खुद को निष्पक्ष नहीं कह सकते। उन्होंने यूजीसी के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 2019 से 2024 के बीच जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में 118 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में समानता से जुड़े नियमों को रोक देना यह संकेत देता है कि जिम्मेदारी से बचा जा सकता है, जबकि समाज में असमानता अभी भी बनी हुई है।
प्रो. गुडावर्ती ने कहा कि भेदभाव से जुड़ी शिकायतों को देखने और उनका समाधान करने वाली व्यवस्था को कमजोर करने के बजाय और मजबूत बनाया जाना चाहिए। इससे जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र या भाषा के आधार पर होने वाले हर तरह के भेदभाव से बेहतर तरीके से निपटा जा सकेगा।
इस अवसर पर Fraternity Movement के अध्यक्ष Ramees E.K. ने रोहित वेमुला एक्ट लागू करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि रोहित वेमुला की संस्थागत मौत ने विश्वविद्यालयों में मौजूद जातिगत भेदभाव की सच्चाई को देश के सामने उजागर कर दिया था। लेकिन लगभग दस साल बीत जाने के बाद भी ऐसा कोई मजबूत कानून नहीं है जो विश्वविद्यालयों को ऐसे मामलों में जवाबदेह बना सके।
उन्होंने कहा कि प्रस्तावित कानून में संस्थागत भेदभाव को अपराध माना जाना चाहिए और जातिगत उत्पीड़न तथा छात्रों की आत्महत्या जैसे मामलों की स्वतंत्र और समयबद्ध जांच सुनिश्चित की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे कानून के बिना कई विश्वविद्यालय भेदभाव के मामलों को अपना आंतरिक मामला बताकर टाल देते हैं, जबकि यह एक गंभीर सामाजिक समस्या है। उनके अनुसार रोहित वेमुला एक्ट छात्रों को जाति, नस्ल और धर्म के आधार पर होने वाले भेदभाव से बचाने और विश्वविद्यालयों को जिम्मेदार बनाने के लिए बहुत जरूरी है।
विश्वविद्यालयों में लोकतांत्रिक माहौल के बारे में बोलते हुए Jawaharlal Nehru University Students’ Union (JNUSU) की अध्यक्ष Aditi Mishra ने कहा कि सरकार चुने हुए छात्र नेताओं और छात्र संगठनों से डरती है, इसलिए उन्हें कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि हाल ही में जेएनयू छात्रसंघ के नेताओं का निलंबन इसी प्रवृत्ति का उदाहरण है।
उन्होंने यह भी कहा कि कई अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों जैसे Aligarh Muslim University (AMU), Jamia Millia Islamia (JMI) और Maulana Azad National Urdu University (MANUU) में कई वर्षों से छात्रसंघ चुनाव नहीं कराए जा रहे हैं। उनके अनुसार इससे छात्रों की लोकतांत्रिक भागीदारी प्रभावित होती है।
उन्होंने आगे कहा कि उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में भी विश्वविद्यालयों में छात्र नेतृत्व को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने मांग की कि सभी विश्वविद्यालयों में जल्द से जल्द छात्रसंघ चुनाव कराए जाएं और जेएनयू छात्रसंघ के नेताओं का निलंबन तुरंत वापस लिया जाए।
इस प्रेस वार्ता में एसआईओ के महासचिव एडवोकेट Anees ur Rahman ने अल्पसंख्यकों के लिए शिक्षा से जुड़ी सहायता योजनाओं में कटौती की आलोचना की। उन्होंने कहा कि सरकार के हाल के फैसले उसके नारे “सबका साथ, सबका विकास” की सच्चाई को सामने लाते हैं।
उन्होंने कहा कि प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति को समाप्त करना और Maulana Azad National Fellowship (MANF) को बंद करना तथा अल्पसंख्यक शिक्षा बजट में लगातार कमी करना इस बात का संकेत है कि अल्पसंख्यक समुदायों की शिक्षा को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा। उनके अनुसार ऐसे फैसलों से न केवल शिक्षा तक पहुंच सीमित होती है बल्कि हाशिये के समुदायों के छात्रों के भविष्य और आत्मसम्मान पर भी असर पड़ता है।
उन्होंने कहा कि एसआईओ का मानना है कि विश्वविद्यालय ऐसे स्थान होने चाहिए जहां न्याय, सम्मान और लोकतांत्रिक भागीदारी को बढ़ावा मिले। लेकिन समानता से जुड़े नियमों को कमजोर करना, छात्र प्रतिनिधित्व को दबाना और अल्पसंख्यकों के लिए शिक्षा से जुड़ी सहायता को खत्म करना, ये सभी कदम मिलकर संविधान में दिए गए समानता के वादे को कमजोर करते हैं।
संगठन ने मांग की कि उच्च शिक्षा में समानता से जुड़े नियमों को तुरंत बहाल और मजबूत किया जाए, रोहित वेमुला एक्ट लागू किया जाए, सभी विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव कराए जाएं और शिक्षा से जुड़ी सहायता योजनाओं को फिर से शुरू किया जाए, ताकि उच्च शिक्षा सभी छात्रों के लिए सुलभ, समावेशी और न्यायपूर्ण बन सके।

