अन्तिम रसूल (सल्ल.) पर पहली ‘वह्य’

अन्तिम रसूल (सल्ल.) पर पहली ‘वह्य’

प्रिय दर्शको,

आपपर सलामती और अल्लाह की रहमत हो। आजकी प्रस्तुति का शीर्षक है ‘अन्तिम नबी पर पहली वह्य’। हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) उस समय तक चालीस वर्ष के हो चुके थे। चिंतन-मनन का सिलसिला जारी था। आप (सल्ल.) सोचते कि यह सृष्टि क्या है? इसका बनानेवाला कौन है? इस जीवन का उद्देश्य क्या है? इस संसार में कैसी-कैसी ग़लत विचारधाराएँ फैली हुई हैं और कैसे-कैसे पथभ्रष्ट करनेवाले दर्शन हैं। ज़ुल्म क्यों हो रहा है? ग़रीब क्यों सताए जा रहे हैं? ग़ुलामी क्यों है? जंगें क्यों हो रही हैं?

अब आप (सल्ल.) ने मक्का से लगभग चार-पाँच किलोमीटर दूर ‘हिरा’ नामक छोटी-सी गुफा है, जिसमें मुश्किल से तीन आदमी (एक आगे और दो पीछे) खड़ो होकर नमाज़ पढ़ सकते हैं। उसपर दूसरी चट्टान छाई हुई है। आप (सल्ल.) ने वहाँ जाना शुरू किया। आप (सल्ल.) वहाँ खाना-पानी लेकर चले जाते और वहाँ रब को पुकारते, उससे मार्गदर्शन माँगते, “ऐ ख़ुदा तू कौन है? क्या चाहता है? हमारी दुनिया में यह क्या हो रहा है? ज़ुल्म क्यों हो रहे हैं? बुराइयाँ क्यों हैं? बुतपरस्ती क्यों हो रही है?”

आप (सल्ल.) एक लम्बे समय तक उस गुफा में जाते रहे। जब भोजन-पानी समाप्त हो जाता तो आते और फिर लेकर जाते। कभी-कभी हज़रत ख़दीजा (रज़ि.) भी वहाँ पर ज़रूरत की चीज़ें भेज दिया करतीं।

फिर एक दिन एक अजीब घटना घटी। वह मानव इतिहास का अत्यंत बहुमूल्य क्षण था। रात अपनी यात्रा पूरी कर चुकी थी। भोर का उजाला फैलना शुरू हो गया था। ऐसे समय मानवता के एक नए भोर का आरंभ हुआ। आप (सल्ल.) बैठे हुए थे। सुबह की रौशनी में आपने देखा कि एक आकृति प्रकट हुई और उसने कुछ लिखा हुआ दिखाते हुए कहा, “पढ़ो!”

आप (सल्ल.) डर से गए। कहा, “मैं पढ़ा-लिखा नहीं हूँ।” और उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि उन्हें कोई बहुत ज़ोर से भींच रहा है। उस आकृति ने फिर कहा, “पढ़ो!” आप (सल्ल.) ने फिर कहा कि मैं पढ़ा-लिखा नहीं हूँ, मैं पढ़ नहीं सकता। फिर उसके बाद उन्हें ऐसा लगा कि उन्हें इतनी ज़ोर से भींचा गया कि उनकी पसलियाँ टूट जाएँगी। फिर वह व्यक्तित्व जो जिब्रील अमीन का व्यक्तित्व था, जो अल्लाह का सबसे प्रतिष्ठत फ़रिश्ता है, जिसका काम अल्लाह तआला के आदेशों को ‘वह्य’ (ईश-प्रकाशना) के द्वारा अल्लाह के पैग़म्बरों तक पहुँचाना होता है। फिर तीसरी बार आप (सल्ल.) को ऐसा महसूस हुआ कि अब तो आपकी पसलियाँ टूट जाएँगी, जान निकल जाएगी।

इसके बाद जिब्रील अमीन ने कहा—
اِقْرَاْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِيْ خَلَقَ خَلَقَ الْاِنْسَانَ مِنْ عَلَقٍ اِقْرَاْ وَرَبُّكَ الْاَكْرَمُ الَّذِيْ عَلَّمَ بِالْقَلَمِ عَلَّمَ الْاِنْسَانَ مَا لَمْ يَعْلَمْ
“पढ़ो, अपने रब के नाम के साथ जिसने पैदा किया, पैदा किया मनुष्य को जमे हुए ख़ून के लोथड़े से। पढ़ो, हाल यह है कि तुम्हारा रब बड़ा ही उदार है, जिसने क़लम के द्वारा शिक्षा दी, मनुष्य को ह ज्ञान प्रदान किया जिसे वह न जानता था।” (क़ुरआन, 96/1-5)

प्राचीन काल में क़लम का प्रयोग बहुत महत्व रखता था। क़लम के द्वारा ही लिखना सिखाया जाता और फिर उसको पढ़ना सिखाया जाता। इस प्रकार एक व्यक्ति को प्राप्त जानकारी दूसरे व्यक्ति तक स्थानांतरित होती थी। और अब आख़िरी बार संसार के तमाम इंसानों का मार्गदर्शन करने के लिए अल्लाह का प्रतिष्ठत फ़रिश्ता जिब्रील उस व्यक्तित्व की सेवा में उपस्थित था, जो चिंतन-मनन कर रहा था और सोच रहा था कि इंसानों को गुमराही से कैसे बचाया जाए और उन्हें सत्यमार्ग पर कैसे लाया जाए। उस दिन जैसे मानवता की एक नई सुबह का आरंभ हुआ था।

उसके बाद नबी (सल्ल.) ने फ़रिश्ते के बताए हुए शब्द दोहराए, बार-बार दोहराए और आप (सल्ल.) को बिल्कुल अच्छी तरह से याद हो गया जो कुछ कहा गया था। इसके अलावा (सल्ल.) आप बुरी तरह घबराए हुए भी थे। आप (सल्ल.) की समझ में नहीं आ रहा था कि आपके साथ यह सब क्या हो रहा था। ‘वह्य’ की जो भारी ज़िम्मेदारी आप के कंधों पर डाली गई थी, आप (सल्ल.) की समझ में नहीं आ रहा था कि आप उसका हक़ कैसे अदा करेंगे। और फिर जब आप (सल्ल.) वहाँ से उतरकर घर की ओर जाने लगे तो एक बार फिर वह फ़रिश्ता प्रकट हुआ और उसने कहा, “आप अल्लाह के रसूल हैं, आपको अल्लाह ने अपना रसूल बनाया है।” यह सुनकर आपकी परेशानी कुछ कम हुई और कुछ हिम्मत बँधी।

प्रिय दर्शको, वह बड़ा प्यारा पल था, वह बहुत क़ीमती पल था, जब नबी (सल्ल.) पर पहली वह्य अवतरित की गई। अल्लाह तआला का वह दीन (व्यवस्था) जा सारी सृष्टि में काम कर रहा है, वह दीन जिसका अनुपालन सूरज और चाँद भी कर रहे हैं, ग्रह और उपग्रह भी। ये सबके सब अल्लाह के लगे-बँधे क़ानून के तहत काम कर रहे हैं।

परन्तु इंसान एक ऐसा जीव है, जिसे अल्लाह से मार्गदर्शन पाने के लिए ज्ञान की आवश्यकता पड़ती है। चुनाँचे इसी उद्देश्य से नबी (सल्ल.) पर क़ुरआन की वह्य का आरंभ हो गया। वह क़ुरआन जो लगातार 23 वर्ष तक अवतरित होता रहा, इस प्रकार कि कभी एक आयत अवतरित हो जाती, कभी कुछ आयतें, कभी एक सूरा, कभी सूरा का कुछ हिस्सा अवतरित होता रहा, यहाँ तक कि क़ुरआन पूरा हो गया।

हमें इस बात पर ख़ुश होना चाहिए कि अल्लाह तआला ने गुमराही की अँधेरी गलियों में भटकती मानवता पर दया की और हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) को सन्देष्टा और मार्गदर्शक बनाकर नियुक्त कर दिया। अल्लाह का शुक्र और एहसान और नबी (सल्ल.) के लिए रहमत और सलामती की दुआ।

व आख़िरु दअवा-न अनिल्हम्दुलिल्लाहि रब्बिल-आलमीन।

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