अल्लाह के रसूल (सल्ल.) मुश्किलों के घेरे में || SADAA Times

अल्लाह के रसूल (सल्ल.) मुश्किलों के घेरे में

प्रिय दर्शको, आप सबको मेरा प्यार भरा सलाम। हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) जो सारे संसार के लिए सर्वथा दयालुता बनाकर भेजे गए थे, उन्हें मक्का में भी और मक्का के बाद मदीना में भी बहुत अधिक कष्टों और विरोधों का सामना करना पड़ा। पिछले एपिसोड में हमारे भाई-बहन सुन चुके हैं कि आप (सल्ल.) की पैग़म्बरी के दसवें वर्ष आप (सल्ल.) के चचा हज़रत अबू-तालिब का, जो आपके लिए बहुत बड़ा सहारा थे, इन्तिक़ाल हो गया था, और फिर कुछ ही दिनों के बाद उम्मुल-मोमिनीन हज़रत ख़दीजा (रज़ि.) का भी इन्तिक़ाल हो गया। इन दोनों की एक बड़ी हैसियत थी। इनकी वजह से मक्का के सरदार नबी (सल्ल.) पर हमला करने से झिझकते थे। अब उन लोगों को खुल-खेलने का मौक़ा मिल रहा था। अतः नबी (सल्ल.) पर मुश्किलों और मुसीबतों का एक पूरा का पूरा तूफ़ान डाल दिया गया।

एक बार नबी (सल्ल.) मस्जिदे-हराम में काबा के पास नमाज़ पढ़ रहे थे कि एक दुष्ट व्यक्ति उठा और उसने कहीं से बकरी की ओझ (आँतों का ढेर) लाकर आप (सल्ल.) की गरदन पर डाल दिया। सोचने की बात है कि अल्लाह के रसूल (सल्ल.) जो अत्यंत शरीफ़ और सभ्य इनसान थे, जो सारी दुनिया के लिए मुक्ति और सफलता का सन्देश लेकर आए थे, जो अत्यंत सभ्य ढंग से लोगों को एक अल्लाह की ओर बुला रहे थे कि वे एक अल्लाह के बन्दे बन जाएँ और मानवता के उच्च आदर्श को अपनाएँ, उनके साथ यह दुर्व्यवहार किया जा रहा था।

एक बार आप (सल्ल.) कहीं जा रहे थे कि एक व्यक्ति ने आपके सिर पर मिट्टी डाल दी। आप जल्दी से घर आए। हज़रत फ़ातिमा (रज़ि.) आप (सल्ल.) की हालत देखकर अनायास रोने लगीं फिर भागकर पानी लाईं और आप (सल्ल.) का सिर धोया।

एक बार ऐसा हुआ कि आप (सल्ल.) नमाज़ में खड़े हुए थे। उधर मक्का के सरदारों की महफ़िल जमी हुई थी। तभी एक व्यक्ति एक चादर लेकर आया और उसने वह चादर आप (सल्ल.) के गले में डाली और उसको फंदा बनाकर कसने लगा। आप (सल्ल.) नमाज़ में थे, नमाज़ तोड़ना भी ठीक होता। संयोग से उधर से अबू-बक्र सिद्दीक़ (रज़ि.) का गुज़र हुआ, उन्होंने जो देखा तो तुरन्त क़रीब आए और उस व्यक्ति को धक्का देकर हटाया, और उससे कहा, “अरे ज़ालिम आदमी, क्या तू इन साहब की जान इसलिए लेना चाहता है कि यह कहते हैं कि एक अल्लाह ही की इबादत करनी चाहिए, जिसका कोई साझी नहीं? हालाँकि तुम लोग इनकी पैग़म्बरी और इनकी शराफ़त की निशानियाँ देख चुके हो।” अबू-बक्र सिद्दीक़ (रज़ि.) पर भी हमले हुए, जो हमेशा आप (सल्ल.) का साथ दिया करते थे। इन सारे कष्टों को आप (सल्ल.) बरदाश्त करते रहे।

अब आप ज़रा सोचिए कि आज के ज़माने में अगर आप (सल्ल.) पर कीचड़ उछाला जाता है, आप (सल्ल.) को बुरा-भला कहा जाता है, आप (सल्ल.) पर ग़लत और निराधार आरोप लगाए जाते हैं, अपमानजनक कार्टून बनाए जाते हैं। उस ज़माने में क्या हो रहा था? शरारती तत्त्वों की रीति पहले भी वही थी, आज भी वही है।

फिर इस बात पर भी ग़ौर कीजिए कि हम जो अल्लाह और उसके दीन की बात, मामवता, सभ्यता और इस्लामी आह्वान की बात लोगों के सामने पेश करते हैं, तो हमें उतनी मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ता है, जो तकलीफ़ें अल्लाह के रसूल (सल्ल.) और आप (सल्ल.) के साथियों को दी गईं ।

हम लोगों को एक अल्लाह की ओर बुलाने का काम कर सकते हैं। हम उसी प्रकार मूल रूप से मानवता के हितैषी हैं, जैसे अल्लाह के तमाम पैग़म्बर रहे हैं, विशेषकर आख़िरी पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) थे। हम गालियाँ सुनेंगे, लेकिन हम प्रत्युत्तर में कुछ न कहेंगे। हमें बुरा-भला कहा जाएगा, हम उसपर सब्र करेंगे। आज भी हमको यही रवैया अपनाना चाहिए।

सलामती हो और हज़ारों-लाखों दुरूदो-सलाम हों नबी-ए-रहमत (सल्ल.) पर जिन्होंने हर प्रकार के कष्ट सहे, लेकिन लोगों के लिए भलाई की ही दुआ की, और यह कहते रहे कि—

رَبِّ اغْفِرْقَوْمِی اِنَّہُمْ لَایَعْلَمُوْنَ
“ऐ मेरे रब, मेरी क़ौम को माफ़ कर दे, क्योंकि ये लोग जानते नहीं हैं।”

व आख़िरु दअवा-न अनिल्हम्दुलिल्लाहि रब्बिल-आलमीन।

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