हज़रत उमर (रज़ि.) का इस्लाम क़ुबूल करना

Umar Embraces Islam || Maulana Ejaz Ahmed Aslam || SADAA Times

हज़रत उमर (रज़ि.) का इस्लाम क़ुबूल करना

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
(अल्लाह दयावान, कृपाशील के नाम से)

प्रिय दर्शको, आज हम हज़रत उमर (रज़ि.) के इस्लाम स्वीकार करने के बारे में सुनेंगे। अल्लाह के रसूल (सल्ल.) की पैग़म्बरी को छठा साल था। विरोध तीव्र रूप ले चुका था। बहुत से सहाबा (रज़ि.) हिजरत करके हब्शा जा चुके थे। हालात की इन सख़्तियों को आप (सल्ल.) महसूस करते थे। आप (सल्ल.) ने अल्लाह से दुआ की, “ऐ अल्लाह, ऐ मेरे पालनहार, इस्लाम की दयनीयता को दूर करने के लिए उमर-बिन-ख़त्ताब या अम्र-बिन-हिशाम (अबू-जहल) में से जो तेरी निगाह में बेहतर हो, उसको इस्लाम स्वीकार करने का सौभाग्य प्रदान कर और उसके माध्यम से हमें बल प्रदान कर।”

हज़रत उमर (रज़ि.) बहुत कठोर स्वभाव के थे, परन्तु अपने इरादे और धुन के पक्के थे। उनकी एक बाँदी (दासी) ने इस्लाम स्वीकार कर लिया था—और आप जानते हैं कि इस्लाम उत्पीड़ितों का समर्थन करता है, मजबूरों और सताए हुए लोगों की मदद करता है और सबसे पहले वे बढ़कर इस्लाम स्वीकार करते हैं— “हज़रत उमर (रज़ि.) उसको मारते, मारते-मारते थक जाते, कहते कि अभी थक गया हूँ, थोड़ी देर के बाद तेरी और पिटाई करूँगा।” एक बार बाँदी ने कहा, “जो चाहो कर लो, अल्लाह तआला तुम्हें इससे ज़्यादा वहाँ सज़ा देगा जहाँ तुमको जाना है।”

हज़रत उमर (रज़ि.) चिंतन-मनन भी करते थे। हज़रत उमर का रिश्तेदार एक परिवार हिजरत करके (मक्का छोड़कर) हब्शा की ओर जा रहा था, हज़रत उमर (रज़ि.) वहाँ गए और जाकर घर की महिला से कहा, “तुम भी जा रही हो?”

वह महिला बोलीं, “हाँ उमर, तुम लोगों ने हमको बहुत सताया। हम अपना घरबार सब कुछ छोड़कर हब्शा चले जाएँगे। अल्लाह चाहेगा तो हमें वहाँ पनाह मिलेगी और हम सूकून की साँस ले सकेंगे।”

हज़रत उमर (रज़ि.) दुखी से हो गए। उस महिला ने अपने पति को बताया, “आज उमर आया था। और जब मैंने यह बात कही कि हम सब कुछ छोड़-छाड़कर जा रहे हैं तो वह दुखी हो गया।”

उनके पति ने पूछा, “क्या तुम समझती हो कि उमर इस्लाम स्वीकार कर लेगा?”

वह बोलीं, “अल्लाह चाहेगा तो ऐसा हो सकता है।”

कहा कि, “ख़त्ताब का गधा जब तक इस्लाम स्वीकार नहीं कर लेता तब तक उमर इस्लाम स्वीकार नहीं कर सकता।”

ऐसे सख़्त थे हज़रत उमर (रज़ि.)। एक दिन हज़रत उमर ने निश्चय किया कि ‘मैं यह सारा मामला ही ख़त्म कर देता हूँ’ और वे तलवार लेकर अल्लाह के रसूल (सल्ल.) की तलाश में निकल पड़े। रास्ते में नुऐम नामक एक सहाबी मिले। उन्होंने हज़रत उमर (रज़ि.) से कहा, “उमर, किधर जा रहे हो?”

उमर (रज़ि.) बोले, “आज क़िस्सा ख़त्म करने के लिए जा रहा हूँ, रोज़-रोज़ का यह अपमान मुझसे सहन नहीं होता।”

हज़रत नुऐम ने देखा कि हज़रत उमर (रज़ि.) के तेवर आज बहुत सख़्त हैं, उन्हें लगा कि कहीं कोई अनर्थ न हो जाए। उन्होंने हज़रत उमर (रज़ि.) को बताया, “कुछ अपनों की भी ख़बर है? तुम्हारी बहन फ़ातिमा और बहनोई दोनों मुसलमान हो चुके हैं।”

हज़रत उमर (रज़ि.) ने आश्चर्य से कहा, “अच्छा! मेरे घर में भी बिगाड़ पैदा हो गया?” और उसके बाद वे अपनी बहन के घर की ओर चल पड़े। वहाँ पहुँचकर दरवाज़े से कान लगाकर सुना, बहुत ही मधुर आवाज़ में कुछ पढ़ने की आवाज़ आ रही थी। हज़रत उमर (रज़ि.) ने ज़ोर से दरवाज़ा खटखटाया। अन्दर से पूछा गया, “कौन है?”

हज़रत उमर बोले, “मैं उमर हूँ, दरवाज़ा खोलो!”

हज़रत उमर (रज़ि.) की आवाज़ सुनते ही घर के अन्दर के लोग काँप गए। हज़रत ख़ब्बाब (रज़ि.) जो वहाँ क़ुरआन की शिक्षा देने आते थे, वह परदे के पीछे छिप गए। वह सोचने लगे, ‘ये लोग तो फिर भी बहन-बहनोई हैं, मुझे तो जान से ही मार देंगे।’

हज़रत उमर (रज़ि.) ने गरजकर पूछा, “क्या पढ़ रहे थे तुम लोग?”

“जी कुछ नहीं।”

हज़रत उमर (रज़ि.) बोले, “मुझे मालूम है, तुम लोगों ने अपने बाप-दादा का दीन छोड़ दिया है, हमारी परम्पराओं से विद्रोह किया है।” इतना कहकर बहनोई की पिटाई करने लगे। बहन ने बचाना चाहा तो बहन की भी पिटाई कर दी। यहाँ तक कि उन्हें लहू-लुहान कर दिया। उस समय हज़रत उमर (रज़ि.) बहुत ग़ुस्ते में थे। नबी (सल्ल.) पर जो ग़ुस्सा था वह बहन-बहनोई पर निकाल रहे थे।

आख़िरकार बहन ने कहा, “उमर, आज तू जो चाहे कर लो, इस्लाम की हक़ीक़त हमारे दिलों में बैठ चुकी है। हम जान दे देंगे लेकिन इस्लाम को नहीं छोड़ेंगे!”

बहन के इस दृढ़ संकल्प को देखकर हज़रत उमर (रज़ि.) चकित रह गए और सोचने लगे कि ‘मेरी छोटी बहन खून में सनी है, फिर भी इतने संकल्प के साथ यह बात कह रही है?’ वे कुछ नर्म पड़े। अन्दर की मानवता जाग उठी। पूछा, “तुम लोग क्या पढ़ रहे थे, लाओ मुझे भी सुनाओ।”

फिर जब वे पन्ने, जिनमें सूरा-20 ताहा की 1 से लेकर 20 तक की आयात लिखी थीं, हज़रत उमर (रज़ि.) के सामने पेश किए गए और हज़रत उमर (रज़ि.) ने उन्हें पढ़ा तो पुकार उठे, “क्या प्यारा कलाम है”

हज़रत ख़ब्बाब (रज़ि.) जो हज़रत उमर (रज़ि.) को देखकर छिप गए थे, वह भी बाहर निकल आए और बोले, “उमर! अभी कुछ दिनों पहले अल्लाह के रसूल ने दुआ की थी कि ऐ अल्लाह उमर को या अबू-जहल को इस्लाम क़ुबूल करवा दे। मुझे लगता है कि अल्लाह के रसूल की वह दुआ क़ुबूल हो गई है।”

हज़रत उमर (रज़ि.) का सिर झुका हुआ था, वह बोले, “मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद (उपास्य) नहीं और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं।”

फिर वहाँ से अल्लाह के रसूल (सल्ल.) की तलाश में निकले। हज़रत अरक़म (रज़ि.) के घर में नबी (सल्ल.) मौजूद थे। लोगों ने देखा कि लम्बे-लम्बे डग भरते हुए उमर (रज़ि.) चले आ रहे हैं। उन्होंने आपस में कहा कि “उमर के तेवर बहुत अजीब से लग रहे हैं। तलवार भी है उसके पास।”

हज़रत हमज़ा (रज़ि.) बोले, “आने दो, अगर अच्छी नीयत से आ रहा है तो ठीक है, वरना उसकी तलवार से ही उसका काम तमाम कर दूँगा।”

हज़रत उमर (रज़ि.) ने दरवाज़ा खटखटाया, दरवाज़ा खोला गया। उमर (रज़ि.) पर नज़र पड़ते ही नबी (सल्ल.) ने पूछा, “उमर, किस इरादे से आए हो?”

हज़रत उमर का दिल तो पिघल चुका था, उसमें ईमान प्रवेश कर चुका था, वह बोले, “ऐ अल्लाह के रसूल, इस्लाम स्वीकार करने के लिए आया हूँ।”

यह सुनकर वहाँ मौजूद लोग ख़ुशी से जैसे खिल गए और सब एक साथ “अल्लाहु अकबर” पुकार उठे। इस घटना के बाद नबी (सल्ल.) ने हज़रत उमर (रज़ि.) को ‘फ़ारूक़’ का ख़िताब (उपनाम) दिया। फ़ारूक़ का अर्थ होता है फ़र्क़ करनेवाला अर्थात् सत्य-असत्य के अंतर को पहचाननेवाला। इससे पहले हज़रत हमज़ा (रज़ि.) जो एक शक्तिशाली व्यक्ति थे, इस्लाम स्वीकार कर ही चुके थे, हज़रत उमर (रज़ि.) के इस्लाम स्वीकार करने से इस्लाम को और भी बल मिला। हज़रत उमर (रज़ि.) वहाँ से गए और जाकर काबा में नमाज़ अदा की। फिर उसके बाद अबू-जहल के घर को गए, दरवाज़ा खटखटाया।

अबू-जहल ने पूछा, “क्या बात है भतीजे? कैसे आए?”

हज़रत उमर (रज़ि.) बोले, “यह कहने के लिए आया हूँ कि मैं इस्लाम स्वीकार कर चुका हूँ।”

अबू-जहल ने यह कहते हुए दरवाज़ा बन्द कर लिया कि “तू बरबाद हो जाए।”

हज़रत उमर (रज़ि.) के इस्लाम के दायरे में आ जाने से इस्लाम को बहुत अधिक बल मिल चुका था। हज़रत उमर (रज़ि.) ने बाद में बहुत बड़े-बड़े काम किए। अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने उनके बारे में कहा था, “उमर जिस रास्ते पर हों, शैतान वहाँ से हट जाता है।” और यह बात भी कही कि “मेरे बाद कोई रसूल नहीं आएगा। मेरे बाद अगर कोई पैग़म्बर होता तो वह उमर ही होते।”

यह था हज़रत उमर (रज़ि.) का महान व्यक्तित्व जिन्होंने इस्लाम को बहुत ताक़त दी। हज़रत अबू-बक्र सिद्दीक़ (रज़ि.) के बाद वह मुसलमानों के ख़लीफ़ा और अमीरुल-मोमिनीन रहे। इस तरह मुहम्मद (सल्ल.) के नेतृत्व में इस्लामी आन्दोलन धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा।

रहमतें बरसें अल्लाह के रसूल (सल्ल.) पर और दर्जे बुलन्द हों हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ि.) के।????

व आख़िरु दअवा-न अनिल्हम्दुलिल्लाहि रब्बिल-आलमीन।

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